
बेमेतरा/रायपुर। CG DASTAK
आर्ट, स्टोरीटेलिंग और लोकल क्लाइमेट नैरेटिव के जरिए बच्चों में पर्यावरण संवेदनशीलता, जिज्ञासा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने पर हुआ मंथन
बेमेतरा/रायपुर। बच्चों को स्थानीय पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन जैसे विषयों से रचनात्मक तरीके से जोड़ने के उद्देश्य से राजधानी रायपुर में दो दिवसीय ‘आर्ट स्टोरी टेलिंग एंड लोकल क्लाइमेट नैरेटिव’ कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में बेमेतरा जिले के दो शिक्षकों ने हिस्सा लिया।

कार्यशाला का आयोजन आईआईएसईआर पुणे के कैवर प्रोजेक्ट, समग्र शिक्षा छत्तीसगढ़, यूनिसेफ और छत्तीसगढ़ रीजनल साइंस सेंटर रायपुर के संयुक्त सहयोग से विधानसभा रोड स्थित जेवियर इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल एक्शन में किया गया।
कार्यशाला में शांत कुमार पटेल, शासकीय प्राथमिक शाला लालपुर, नवागढ़ और संजय कुमार कश्यप, प्रधानपाठक, शासकीय प्राथमिक शाला कंडरका, बेरला ने सहभागिता की।
कहानी के जरिए बच्चों को पर्यावरण से जोड़ने पर जोर
कार्यशाला के प्रथम दिवस छत्तीसगढ़ साइंस सेंटर के महानिदेशक कविश्वर ने कहानी की उपयोगिता पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि कहानी केवल बच्चों को जानकारी देने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह उन्हें अपने आसपास की दुनिया को देखने, समझने और उसके बारे में स्वतंत्र रूप से विचार करने के लिए प्रेरित करने का प्रभावी माध्यम हो सकती है।
कार्यशाला में कला और कहानी के माध्यम से बच्चों को स्थानीय पर्यावरण, प्रकृति और जलवायु परिवर्तन से जोड़ने की गतिविधियों पर चर्चा की गई। इसका उद्देश्य बच्चों में केवल पर्यावरण संबंधी जानकारी बढ़ाना नहीं, बल्कि उनमें जिज्ञासा, रचनात्मक सोच, अवलोकन क्षमता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना भी है।
‘जुगनू’ क्लाइमेट टैब्लॉइड का विमोचन
कार्यशाला के दौरान बच्चों के लिए तैयार किए गए भारत के पहले द्विभाषी हिंदी-अंग्रेजी क्लाइमेट टैब्लॉइड ‘जुगनू’ का भी विमोचन किया गया।
आयोजकों के अनुसार ‘जुगनू’ का उद्देश्य बच्चों में पर्यावरणीय चुनौतियों को लेकर केवल चिंता पैदा करना नहीं, बल्कि उन्हें अपने आसपास के परिवेश को समझने, सवाल पूछने, अपनी आवाज व्यक्त करने और सकारात्मक बदलाव के लिए पहल करने के लिए प्रेरित करना है।

कार्यशाला में शामिल शिक्षक शांत कुमार पटेल ने बताया कि स्टोरीटेलिंग गतिविधियों के माध्यम से बच्चों के स्थानीय परिवेश, दैनिक अनुभवों और प्रकृति को कहानी से जोड़ा जा सकता है। इससे सीखने की प्रक्रिया बच्चों के लिए अधिक रोचक और प्रभावी बन सकती है।
उन्होंने कहा कि कहानी सिर्फ जानकारी देने का माध्यम नहीं है। इसके जरिए बच्चों में अवलोकन, जिज्ञासा, स्वतंत्र सोच, कल्पनाशीलता और अपनी बात अभिव्यक्त करने की क्षमता विकसित की जा सकती है।
उन्होंने बताया कि इस तरह की गतिविधियों के माध्यम से जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण जैसे गंभीर विषयों को बच्चों के सामने सहज और रचनात्मक तरीके से रखा जा सकता है।
विभिन्न जिलों के शिक्षक हुए शामिल
कार्यशाला के समापन दिवस पर छत्तीसगढ़ रीजनल साइंस सेंटर के प्रोजेक्ट डायरेक्टर डॉ. शिरीष कुमार सिंह, एनआईटी रायपुर के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर डॉ. राज कुमार साहू, प्रोजेक्ट लीड एवं ‘जुगनू’ की पब्लिशर डॉ. शालिनी शर्मा सहित शिवानी देशमुख, प्रियंका, प्राची जोशी, शालिनी पटेल और छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों से आए शिक्षक-शिक्षिकाएं मौजूद रहे।
इस कार्यशाला के माध्यम से शिक्षकों को कला, कहानी और स्थानीय जलवायु कथाओं के जरिए बच्चों में पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने के नए तरीकों से परिचित कराया गया।









