
नई दिल्ली। CG DASTAK
नई दिल्ली। भारत में कामकाज से जुड़ने वाली महिलाओं की संख्या में पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। महिलाएं खेती-किसानी, स्वरोजगार, पारिवारिक व्यवसाय और नौकरी सहित अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी भागीदारी बढ़ा रही हैं। हालांकि, रोजगार के अवसर बढ़ने के बावजूद घर और बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट और ग्राफिक्स में महिलाओं के कामकाज से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलू सामने आए हैं। इनमें महिलाओं की रोजगार भागीदारी, बिना वेतन किए जाने वाले काम, ग्रामीण क्षेत्रों में उनकी भूमिका और पुरुषों की तुलना में कम कमाई जैसे मुद्दे शामिल हैं।
आठ साल में कामकाजी महिलाओं की संख्या में बड़ा बदलाव
रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2017-18 से 2025 के बीच कामकाज से जुड़ी महिलाओं की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। विशेष रूप से बिना वेतन वाले घरेलू और पारिवारिक कामों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है।
ग्राफिक के मुताबिक, बिना वेतन वाले कामों से जुड़ी महिलाओं की संख्या 1.39 करोड़ से बढ़कर 5.60 करोड़ हो गई। वहीं, परिवार के कामों में महिलाओं की संख्या 2.88 करोड़ से बढ़कर 4.93 करोड़ बताई गई है।
दूसरी ओर, नियमित और सुरक्षित नौकरी के दायरे में महिलाओं की हिस्सेदारी के आंकड़ों में 10.5 प्रतिशत से 9.3 प्रतिशत तक की गिरावट दिखाई गई है। इन आंकड़ों का सही अर्थ समझने के लिए संबंधित रिपोर्ट के मूल स्रोत, परिभाषा और गणना की पद्धति को देखना जरूरी है।
ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी ज्यादा
महिलाओं की कामकाज में भागीदारी ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में अलग-अलग दिखाई देती है। उपलब्ध ग्राफिक के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में महिला कामगारों की भागीदारी 23.7 प्रतिशत से बढ़कर 44.9 प्रतिशत हुई, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 18.2 प्रतिशत से बढ़कर 25.9 प्रतिशत बताई गई है।
ग्रामीण इलाकों में महिलाएं खेती-किसानी, पशुपालन और पारिवारिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। कई महिलाएं घर की जिम्मेदारियों के साथ खेतों में भी काम करती हैं। इसके बावजूद उनके योगदान का आर्थिक मूल्य हमेशा स्पष्ट रूप से सामने नहीं आ पाता।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि गांवों में काम करने वाली महिलाओं का बड़ा हिस्सा खेती-किसानी से जुड़ा हुआ है। ऐसे में ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका को समझना जरूरी है।
रोजगार बढ़ा, लेकिन घरेलू जिम्मेदारियां कम नहीं हुईं
महिलाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक घर और बाहर के काम के बीच संतुलन बनाना है। नौकरी या आजीविका से जुड़ने के बाद भी खाना बनाना, सफाई करना, बच्चों की देखभाल और परिवार के अन्य सदस्यों की जरूरतें पूरी करने की जिम्मेदारी अक्सर महिलाओं पर ही रहती है।
इस वजह से कई महिलाओं को आराम, नींद और अपने व्यक्तिगत विकास के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता। यदि घर के कामों में पुरुषों की भागीदारी नहीं बढ़ती, तो महिलाओं पर दोहरी जिम्मेदारी बनी रहती है।
कामकाजी महिलाओं के लिए यह स्थिति शारीरिक थकान के साथ-साथ उनके करियर और कौशल विकास को भी प्रभावित कर सकती है।
कमाई में अब भी अंतर
महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ने के बावजूद वेतन और कमाई में अंतर एक अहम मुद्दा बना हुआ है। उपलब्ध ग्राफिक में ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की औसत कमाई पुरुषों की तुलना में लगभग 45 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में लगभग 61 प्रतिशत बताई गई है।
हालांकि, इन प्रतिशतों का सटीक अर्थ और आधार मूल रिपोर्ट से सत्यापित किया जाना चाहिए। यह स्पष्ट होना जरूरी है कि आंकड़े महिलाओं की पुरुषों के मुकाबले कमाई के अनुपात को दिखाते हैं या किसी अन्य मापदंड को।
समान काम के लिए उचित वेतन, सुरक्षित कार्यस्थल और रोजगार के बेहतर अवसर महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता के लिए महत्वपूर्ण हैं।
पंचायतों में महिला नेतृत्व भी महत्वपूर्ण
महिलाओं की भागीदारी केवल रोजगार तक सीमित नहीं है। स्थानीय शासन और पंचायतों में भी महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है।
दिए गए ग्राफिक के अनुसार, देश में कुल 24.41 लाख पंचायत प्रतिनिधियों में से 12.14 लाख महिलाएं हैं। यह संख्या लगभग 49.75 प्रतिशत बताई गई है।

यह आंकड़ा स्थानीय लोकतंत्र में महिलाओं की बड़ी भागीदारी को दर्शाता है। हालांकि, प्रतिनिधित्व के साथ-साथ निर्णय लेने की स्वतंत्रता, प्रशिक्षण और प्रशासनिक सहयोग भी जरूरी हैं, ताकि महिला प्रतिनिधि प्रभावी ढंग से अपनी भूमिका निभा सकें।
महिलाओं के लिए क्या बदलने की जरूरत है?
महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक भागीदारी बढ़ाने के लिए केवल रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। घरेलू कामों में परिवार के सभी सदस्यों की भागीदारी, बच्चों की देखभाल की सुविधाएं, सुरक्षित कार्यस्थल, समान वेतन और कौशल विकास के अवसर भी जरूरी हैं।
महिलाओं के काम को केवल नौकरी या वेतन के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए। घर और परिवार के लिए किया जाने वाला बिना वेतन का काम भी समाज और अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

निष्कर्ष: महिलाओं की बढ़ती भागीदारी सकारात्मक बदलाव का संकेत है, लेकिन वास्तविक समानता के लिए घरेलू जिम्मेदारियों का उचित बंटवारा और आर्थिक अवसरों तक समान पहुंच भी जरूरी है।
महत्वपूर्ण नोट: इस खबर में शामिल संख्यात्मक आंकड़े उपलब्ध कराए गए स्क्रीनशॉट और ग्राफिक्स पर आधारित हैं। प्रकाशन से पहले मूल रिपोर्ट और आंकड़ों के स्रोत की पुष्टि करना उचित होगा।









