
Defense News: CG DASTAK

नई दिल्ली। भारत और रूस संयुक्त रूप से ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल के नए और अत्याधुनिक संस्करण विकसित कर रहे हैं। इनमें ब्रह्मोस का छोटा (BrahMos-NG), हल्का और हाइपरसोनिक वर्जन शामिल है। भारत में रूस के राजदूत डेनिस अलीपोव ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि इन नई मिसाइलों के विकसित होने से भारतीय सशस्त्र बलों की मल्टी-डोमेन स्ट्राइक क्षमता में बड़ा इजाफा होगा।
यह घोषणा ब्रह्मोस मिसाइल के पहले सफल परीक्षण के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर की गई। 12 जून 2001 को ओडिशा के चांदीपुर परीक्षण केंद्र से ब्रह्मोस का पहला सफल परीक्षण किया गया था। रूस के राजदूत ने बताया कि दोनों देश 800 किलोमीटर मारक क्षमता वाले P751 कार्यक्रम, पनडुब्बी से लॉन्च होने वाले संस्करण, विमान से दागे जाने वाले हल्के संस्करण और हाइपरसोनिक ब्रह्मोस पर मिलकर काम कर रहे हैं।
ब्रह्मोस-NG होगा हल्का और अधिक घातक
मौजूदा ब्रह्मोस मिसाइल का वजन लगभग 3 टन है और इसकी गति मैक 2.8 है। वहीं विकसित किए जा रहे BrahMos-NG (नेक्स्ट जेनरेशन) का वजन करीब 1.2 टन होगा और इसकी रफ्तार मैक 5 तक पहुंच सकती है। यह आकार में छोटा, हल्का और स्टील्थ तकनीक से लैस होगा, जिससे इसे दुश्मन के रडार से बचने में भी मदद मिलेगी।
तेजस और सुखोई पर होगी तैनाती
हल्के वजन के कारण ब्रह्मोस-NG को LCA तेजस और Su-30MKI जैसे लड़ाकू विमानों पर आसानी से तैनात किया जा सकेगा। रक्षा सूत्रों के अनुसार, एक Su-30MKI विमान एक साथ पांच ब्रह्मोस-NG मिसाइलें ले जाने में सक्षम होगा। वहीं जमीनी लॉन्चर आठ मिसाइलों को तैनात कर सकेंगे और नौसेना के युद्धपोतों पर भी इसकी संख्या बढ़ाई जा सकेगी।
स्वदेशी तकनीक बढ़ेगी, लागत होगी कम
ब्रह्मोस एयरोस्पेस के प्रमुख जयतीर्थ जोशी ने बताया कि भविष्य के संस्करणों में कंपोजिट मैटेरियल का अधिक उपयोग किया जाएगा, जिससे मिसाइल का वजन कम होगा और लागत में लगभग 20 प्रतिशत तक कमी आएगी। साथ ही मिसाइल में स्वदेशी पुर्जों और स्वदेशी वॉरहेड का उपयोग बढ़ाया जाएगा। उन्होंने बताया कि स्वदेशी वॉरहेड के सफल परीक्षण के बाद इसे मौजूदा सिस्टम में शामिल किया जाएगा।
भारत और रूस की यह संयुक्त परियोजना भारतीय रक्षा क्षमता को नई ऊंचाई देने के साथ-साथ स्वदेशी रक्षा उत्पादन को भी मजबूती प्रदान करेगी।









