महासमुंद जिले में डीएमएफ (जिला खनिज न्यास) मद से स्प्रेयर खरीदी में गड़बड़ी का मुद्दा एक बार फिर विधायक चातुरी नंद ने विधानसभा में उठाया।

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*विधायक चातुरी नंद ने डीएमएफ मद से स्प्रेयर खरीदी घोटाले का मुद्दा विधानसभा में उठाया*

– जांच के बावजूद कृषि उप संचालक के खिलाफ कार्रवाई करने से बच रही है शासन प्रशासन 

डीएमएफ मद में हुई गंभीर अनियमितताओं को लेकर सरकार स्वयं विधानसभा के पटल पर यह स्वीकार कर चुकी है कि विभागीय जांच में भंडार क्रय नियमों के उल्लंघन के तथ्य सामने आए हैं। इसके बावजूद आज तक दोषी अधिकारियों के विरुद्ध ठोस कार्रवाई नहीं होना यह साबित करता है कि भ्रष्टाचार में संलिप्त अधिकारियों को शासन-प्रशासन का खुला संरक्षण प्राप्त है।

विधानसभा में विधायक चातुरी नंद के सवाल के जवाब में सरकार द्वारा दिए गए लिखित उत्तर के अनुसार जांच दल की रिपोर्ट के आधार पर संचालनालय कृषि ने दिनांक 02 दिसंबर 2025 को अपना अभिमत प्रस्तुत किया था, जिसके आधार पर 09 जनवरी 2026 को तत्कालीन उप संचालक कृषि, महासमुंद श्री फागुराम कश्यप को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। इसके बाद उनके द्वारा प्रस्तुत प्रतिवाद का परीक्षण करने के पश्चात संचालनालय कृषि ने 25 जून 2026 को स्पष्ट रूप से अभिमत दिया कि उनका जवाब समाधानकारक नहीं है।

यह स्वयं सरकार की स्वीकारोक्ति है कि विभागीय जांच में गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं और संबंधित अधिकारी का स्पष्टीकरण भी संतोषजनक नहीं पाया गया। इसके बावजूद आज तक किसी प्रकार की कठोर विभागीय अथवा दंडात्मक कार्रवाई नहीं होना अनेक गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब विभागीय जांच में भंडार क्रय नियमों के उल्लंघन की पुष्टि हो चुकी है, तब आखिर किसके दबाव में संबंधित अधिकारी को बचाया जा रहा है? यदि अधिकारी निर्दोष था तो कारण बताओ नोटिस जारी क्यों किया गया, और यदि उसका जवाब असंतोषजनक पाया गया तो कार्रवाई अब तक लंबित क्यों है?

सरकार के लिखित उत्तर में यह भी स्वीकार किया गया है कि स्प्रेयर खरीदी के लिए जारी पहली निविदा निरस्त करनी पड़ी, उसके बाद जारी दूसरी निविदा भी निरस्त हुई, और अंततः तीसरी निविदा में अधिकांश फर्मों को तकनीकी रूप से अपात्र घोषित कर दिया गया। इसके बाद केवल एक फर्म – मातादी इलेक्ट्रिकल्स, राजिम को पात्र मानते हुए वित्तीय निविदा खोली गई और नेगोसिएशन के पश्चात उसी फर्म को कार्यादेश जारी कर दिया गया।

यह पूरी प्रक्रिया अपने आप में कई गंभीर संदेह उत्पन्न करती है। जिस फर्म को लेकर पहले से विवाद और शिकायतें थीं, आखिर उसी फर्म को दोबारा अवसर क्यों दिया गया? क्या पूरे प्रदेश में केवल वही एक फर्म थी जो तकनीकी रूप से पात्र थी, या फिर पूरी निविदा प्रक्रिया किसी विशेष कंपनी को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से संचालित की गई?

यह भी अत्यंत आश्चर्यजनक है कि सरकार विधानसभा में स्वयं स्वीकार कर रही है कि मामले में कार्रवाई “प्रक्रियाधीन” है। सवाल यह है कि जब जांच पूरी हो चुकी, अधिकारी का जवाब असंतोषजनक पाया जा चुका और नियमों के उल्लंघन की पुष्टि भी हो चुकी है, तब आखिर कार्रवाई में इतनी देरी क्यों की जा रही है?

बार-बार शिकायतें होने के बावजूद यदि भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं होती, तो इससे यह स्पष्ट संदेश जाता है कि प्रदेश में भ्रष्टाचार करने वालों को शासन-प्रशासन का संरक्षण प्राप्त है। यह केवल एक अधिकारी का मामला नहीं है, बल्कि सरकारी धन के दुरुपयोग और पूरी खरीद प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।

विधायक चातूरी नंद ने कहा कि हम सरकार से मांग करते हैं कि इस पूरे प्रकरण की स्वतंत्र एजेंसी जैसे आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) अथवा एसीबी (ACB) से निष्पक्ष जांच कराई जाए। विभागीय जांच में दोषी पाए गए अधिकारियों के विरुद्ध तत्काल विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई की जाए। साथ ही पूरी निविदा प्रक्रिया, जांच प्रतिवेदन तथा संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं ताकि प्रदेश की जनता सच्चाई जान सके।

सरकारी धन जनता की गाढ़ी कमाई का धन है। यदि उस धन के उपयोग में भ्रष्टाचार हुआ है तो दोषियों को बचाने के बजाय कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई होना ही सुशासन की पहचान है। यदि सरकार इस मामले में निष्पक्ष कार्रवाई नहीं करती, तो यह स्पष्ट माना जाएगा कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध उसकी कथनी और करनी में बड़ा अंतर है

विदित हो कि मानसून सत्र में विधायक चातुरी नंद जनहित के मुद्दों को प्रमुखता से उठा रही है.

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