रायपुर के चंदखुरी में अनोखी परंपरा: दशहरे के अगले दिन होता है रावण दहन, 21 अक्टूबर को मनेगा ग्यारस का दशहरा

0

रायपुर। CG DASTAK 

रायपुर। छत्तीसगढ़ में दशहरा पर्व अलग-अलग परंपराओं और मान्यताओं के साथ मनाया जाता है। राजधानी रायपुर के चंदखुरी गांव में दशहरा मनाने की परंपरा प्रदेश के दूसरे गांवों से अलग है। यहां विजयादशमी के दिन रावण दहन नहीं होता, बल्कि अगले दिन ग्यारस तिथि पर रावण दहन किया जाता है। इस वर्ष भी चंदखुरी में 21 अक्टूबर को ग्यारस का दशहरा मनाया जाएगा।

चंदखुरी को माता कौशल्या की जन्मभूमि और भगवान श्रीराम का ननिहाल माना जाता है। यहां की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं लंबे समय से लोगों के आकर्षण का केंद्र रही हैं। ग्यारस के दिन दशहरा मनाने की परंपरा आसपास के गांवों के लोगों को भी एक साथ जोड़ती है।

पहले होती थी भव्य रामलीला

स्थानीय लोगों के मुताबिक, पहले चंदखुरी में भव्य रामलीला का आयोजन किया जाता था। आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग दशहरा मनाने पहुंचते थे। गांवों में दशमी के दिन दशहरा मनाने के बाद लोग अगले दिन चंदखुरी आते थे और यहां रामलीला देखने के साथ रावण दहन में शामिल होते थे। इसी क्रम में यहां एक दिन बाद दशहरा मनाने की परंपरा विकसित हुई, जो आज भी जारी है।

कौशल्या माता मंदिर के पुजारी रमेश शर्मा के अनुसार, ग्यारस पर दशहरा मनाने की परंपरा पुरखों के समय से चली आ रही है। हालांकि, इसकी शुरुआत किसने और कब की थी, इसकी सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है।

अब नहीं होती रामलीला, फिर भी कायम है परंपरा

स्थानीय निवासी दिनेश ठाकुर बताते हैं कि पहले चंदखुरी में भव्य रामलीला होती थी। आसपास के गांवों के लोग दशहरा मनाने और रामलीला देखने के लिए यहां पहुंचते थे। उस समय चंदखुरी आसपास के क्षेत्र का एक प्रमुख गांव माना जाता था।

समय के साथ रामलीला का आयोजन बंद हो गया, लेकिन ग्यारस के दिन दशहरा मनाने की परंपरा समाप्त नहीं हुई। आज भी आसपास के गांवों से लोग इस परंपरा को देखने और पर्व में शामिल होने पहुंचते हैं।

पिता के बाद बेटा बना रहा रावण का पुतला

चंदखुरी के स्थानीय मूर्तिकार चमन विश्वकर्मा दशहरे के लिए रावण का पुतला तैयार करते हैं। उन्होंने बताया कि उनका परिवार लंबे समय से यह काम करता आ रहा है। उनसे पहले उनके पिता रावण का पुतला बनाते थे। अब वह इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

मूर्तिकार होने के कारण उनका परिवार गणेश और दुर्गा की प्रतिमाएं भी बनाता है। इन प्रतिमाओं के निर्माण के बाद दशहरे के लिए रावण का पुतला तैयार किया जाता है। इस तरह रावण का पुतला बनाना उनके परिवार की परंपरा का हिस्सा बन गया है।

छत्तीसगढ़ में अलग पहचान रखता है चंदखुरी का दशहरा

प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में विजयादशमी के दिन रावण दहन किया जाता है, लेकिन चंदखुरी में ग्यारस के दिन दशहरा मनाने की परंपरा इसे अलग पहचान देती है। धार्मिक आस्था, गांवों के आपसी जुड़ाव और पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं के कारण यह परंपरा आज भी जीवित है।

चंदखुरी का यह आयोजन बताता है कि त्योहारों का महत्व केवल तिथि तक सीमित नहीं होता, बल्कि उनसे जुड़ी स्थानीय परंपराएं और सामुदायिक सहभागिता भी उन्हें विशेष बनाती हैं।

छत्तीसगढ़ की संस्कृति, परंपराओं और ताजा खबरों के लिए पढ़ें — www.cgdastak.com

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here