भानुप्रतापपुर में पुनर्वासित परिवारों ने बनाया हुनर को रोजगार का जरिया, 700 से ज्यादा राखियां तैयार

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भानुप्रतापपुर। CG DASTAK 

भानुप्रतापपुर। नक्सल प्रभावित एवं पुनर्वासित परिवारों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए कांकेर जिले में एक सकारात्मक पहल शुरू की गई है। भानुप्रतापपुर के चौगेल पुनर्वास केंद्र में बिहान योजना के तहत आत्मसमर्पित नक्सलियों और पुनर्वासित परिवारों को राखी निर्माण का प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण के बाद अब तक 700 से अधिक राखियां तैयार की जा चुकी हैं।

राखी निर्माण से जुड़ी पुनर्वासित परिवारों की महिलाएं

रक्षाबंधन पर्व को देखते हुए चौगेल स्थित नक्सल प्रभावित परिवार पुनर्वास केंद्र में इन दिनों रंग-बिरंगी राखियां तैयार की जा रही हैं। इस पहल के जरिए पुनर्वासित परिवारों और आत्मसमर्पित नक्सलियों को हुनर सीखने के साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार और स्वरोजगार से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

राखी निर्माण का प्रशिक्षण संकुल संगठन केवटी के अंतर्गत कमला तारम और पार्वती आंचले द्वारा दिया गया। प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को राखी बनाने के अलग-अलग तरीकों और डिजाइन तैयार करने की जानकारी दी गई।

700 से ज्यादा राखियां तैयार

प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद अब तक 700 से अधिक राखियां तैयार की जा चुकी हैं। इन राखियों को तैयार करने के साथ ही इनके विपणन को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि इससे जुड़े परिवारों को अपनी मेहनत का आर्थिक लाभ मिल सके।

अधिकारियों और संबंधित समूहों की इस पहल का उद्देश्य पर्व विशेष के लिए उत्पाद तैयार करने के साथ-साथ पुनर्वासित परिवारों को नियमित आजीविका के अवसरों से जोड़ना है।

बिहान योजना से आत्मनिर्भरता की ओर कदम

बिहान योजना के माध्यम से शुरू की गई यह गतिविधि पारंपरिक पर्व को आजीविका से जोड़ने का उदाहरण बन रही है। पुनर्वास केंद्र में प्रशिक्षण और उत्पादन की गतिविधियों के जरिए परिवारों को अपने हुनर का इस्तेमाल कर आय अर्जित करने का अवसर मिल रहा है।

चौगेल का पुनर्वास केंद्र अब केवल पुनर्वास तक सीमित नहीं रहकर कौशल विकास और आत्मनिर्भरता की दिशा में भी काम कर रहा है।

हुनर से रोजगार और रोजगार से सम्मान

राखी निर्माण की यह पहल पुनर्वासित परिवारों को आर्थिक रूप से मजबूत करने के साथ उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का माध्यम बन रही है। हुनर के जरिए रोजगार और रोजगार के जरिए सम्मान हासिल करने की दिशा में इसे एक सकारात्मक कदम माना जा सकता है।

रक्षाबंधन जैसे पारंपरिक पर्व से जुड़ी इस पहल ने पुनर्वासित परिवारों के लिए आत्मनिर्भरता की नई उम्मीद पैदा की है।

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