
बीजापुर। CG DASTAK
छत्तीसगढ़ और तेलंगाना की सीमा से लगे कर्रेगुट्टा पहाड़ियों का इलाका कभी नक्सल गतिविधियों का बेहद महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता था। इसी क्षेत्र की तलहटी में स्थित ताड़पाला गांव भी लंबे समय तक नक्सली प्रभाव और सुरक्षा चुनौतियों के कारण वीरान होता चला गया। कभी जहां ग्रामीण झोपड़ियों में रहते थे और खेती-किसानी तथा जंगल से मिलने वाली उपज के सहारे जीवन चलाते थे, आज वहां सुरक्षा बलों की मौजूदगी दिखाई देती है।

कर्रेगुट्टा की पहाड़ियां छत्तीसगढ़ के बीजापुर और तेलंगाना के सीमावर्ती इलाकों तक फैली हैं। 2025 में यहां सुरक्षा बलों ने बड़ा एंटी-नक्सल ऑपरेशन चलाया था। केंद्र सरकार के अनुसार इस अभियान में 31 नक्सली मारे गए और बड़ी संख्या में हथियार बरामद किए गए।
कभी ग्रामीणों से गुलजार था ताड़पाला
स्थानीय लोगों के अनुसार ताड़पाला में 1990 के दशक तक ग्रामीण परिवार रहते थे। गांव के लोग आसपास के बाजारों में जाकर जंगल से मिलने वाली चीजें और अपने बनाए सामान बेचते थे। उस समय इलाके में सड़क, मोबाइल और दूसरी आधुनिक सुविधाएं बेहद सीमित थीं।

लेकिन समय के साथ नक्सली प्रभाव बढ़ता गया। ग्रामीणों के लिए जंगल और पहाड़ी क्षेत्र में रहना मुश्किल होता चला गया। धीरे-धीरे परिवार गांव छोड़कर दूसरी जगहों पर चले गए और ताड़पाला की बस्ती वीरान होती गई।
रिपोर्ट के मुताबिक कुछ ग्रामीणों के गांव छोड़ने के बाद उनका आपस में संपर्क भी टूट गया। कई परिवार आज कहां हैं और उनकी जमीन-जायदाद की वर्तमान स्थिति क्या है, इसकी स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है।
ग्रामीणों की जगह बना नक्सलियों का कॉरिडोर
जिस रास्ते से कभी ग्रामीण बाजार आते-जाते थे, वही इलाका बाद में नक्सलियों के लिए महत्वपूर्ण आवाजाही का रास्ता बन गया। कर्रेगुट्टा की भौगोलिक स्थिति ने इसे रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बना दिया था।

पहाड़, घना जंगल और छत्तीसगढ़-तेलंगाना-आंध्र क्षेत्र की नजदीकी ने नक्सलियों को एक राज्य से दूसरे राज्य में आवाजाही का रास्ता दिया। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक कर्रेगुट्टा क्षेत्र में नक्सलियों ने लंबे समय तक अपना मजबूत नेटवर्क बनाया था।
2025 के बड़े ऑपरेशन के दौरान सुरक्षा बलों को भारी मात्रा में IED और अन्य सामग्री मिलने की जानकारी सामने आई थी।
2025 में बदली इलाके की तस्वीर
कर्रेगुट्टा में बड़े ऑपरेशन के बाद सुरक्षा बलों की मौजूदगी लगातार बढ़ी। बाद में ताड़पाला के पास सुरक्षा एवं जन सुविधा कैंप भी स्थापित किया गया। रिपोर्टों के मुताबिक यह कैंप नवंबर 2025 में स्थापित किया गया था और इसका उद्देश्य सुरक्षा के साथ-साथ क्षेत्र में सड़क, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा और दूसरी सुविधाओं की पहुंच बढ़ाना भी था।

अब जिस इलाके में कभी सुरक्षा बलों के लिए पहुंचना चुनौती माना जाता था, वहां सड़क निर्माण और सुरक्षा कैंप जैसी गतिविधियां दिखाई दे रही हैं।
क्या ग्रामीण फिर लौटेंगे?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ताड़पाला और आसपास के वीरान गांवों में फिर से ग्रामीण परिवार लौटेंगे?
छत्तीसगढ़ के वन मंत्री केदार कश्यप के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि क्षेत्र में परिस्थितियां अब बदल चुकी हैं और नक्सल प्रभाव कम होने के बाद ग्रामीण अपने गांव लौट सकते हैं।

लेकिन जमीन पर तस्वीर इतनी आसान नहीं है। दशकों पहले गांव छोड़ चुके परिवारों का पता लगाना, उनके जमीन संबंधी रिकॉर्ड तलाशना, मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना और सुरक्षा का भरोसा कायम करना बड़ी चुनौती होगी।
ग्रामीणों के सामने यह सवाल भी है कि जिन जमीनों और घरों को वे वर्षों पहले छोड़कर गए थे, उनकी वर्तमान स्थिति क्या है और उनकी अगली पीढ़ी वापस गांव में रहना चाहेगी या नहीं।
सड़क पहुंची, लेकिन गांव अब भी खाली
ताड़पाला तक सड़क निर्माण का काम भी आगे बढ़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक BRO की ओर से सड़क बनाई जा रही है। सड़क के साथ सुरक्षा बलों की पहुंच भी बढ़ रही है।
लेकिन सड़क बनने के बावजूद गांव में पहले जैसी ग्रामीण आबादी दिखाई नहीं देती। पुराने घरों की जगह अब जंगल और सुरक्षा बलों की मौजूदगी नजर आती है।

यही तस्वीर बताती है कि नक्सलवाद का असर केवल सुरक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं था, बल्कि उसने कई गांवों की सामाजिक और आर्थिक संरचना को भी बदल दिया।
कर्रेगुट्टा: नक्सलियों के मजबूत गढ़ से सुरक्षा क्षेत्र तक
कर्रेगुट्टा कभी नक्सलियों के सबसे सुरक्षित ठिकानों में गिना जाता था। 2025 के ऑपरेशन में सुरक्षा बलों ने यहां बड़े पैमाने पर अभियान चलाया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार अभियान के दौरान 31 नक्सली मारे गए और 35 हथियार बरामद किए गए।
इसके बाद क्षेत्र में नए सुरक्षा कैंप स्थापित किए गए। नवंबर 2025 की रिपोर्टों में ताड़पाला के पास स्थापित कैंप को CRPF और CoBRA की आगे की ऑपरेशनल गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण बताया गया था।

अब चुनौती केवल नक्सल प्रभाव खत्म करने की नहीं, बल्कि वीरान हो चुके गांवों में फिर से जिंदगी लौटाने की है।









