खारुन करुण कथा-3: महादेव घाट से सोमनाथ तक दम तोड़ती खारुन, जलकुंभी, प्रदूषण और अतिक्रमण ने छीनी नदी की पहचान

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रायपुर। Cg dustak 

कभी रायपुर की जीवनदायिनी कही जाने वाली खारुन नदी आज अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रही है। जिस नदी का पानी कभी पीने और स्नान के लिए उपयोग किया जाता था, आज वही नदी प्रदूषण, जलकुंभी, अतिक्रमण और औद्योगिक अपशिष्ट की मार झेल रही है। महादेव घाट से सोमनाथ तक की जमीनी पड़ताल में खारुन की बदहाल तस्वीर सामने आई है, जहां कई किलोमीटर तक बहते पानी की जगह

केवल जलकुंभी का हरा विस्तार दिखाई देता है।

यह ग्राउंड रिपोर्ट महादेव घाट से सोमनाथ तक की यात्रा के दौरान नदी की वास्तविक स्थिति, प्रदूषण और स्थानीय लोगों की समस्याओं को सामने लाती है।

महादेव घाट से शुरू हुई बदहाली

महादेव घाट स्थित खारुन पुल के नीचे से यात्रा शुरू होते ही नदी की बदहाल स्थिति नजर आने लगी। पुल के नीचे प्लास्टिक कचरे के ढेर, काले पड़ चुके पानी और जलकुंभी के घने फैलाव ने साफ संकेत दिया कि खारुन गंभीर प्रदूषण की चपेट में है।

रायपुरा, सरोना और चंदनडीह तक नदी लगभग पूरी तरह जलकुंभी से ढकी मिली। कई स्थानों पर शहर के गंदे नाले सीधे नदी में गिरते दिखाई दिए, जिससे पानी की गुणवत्ता और खराब हो चुकी है।

ईंट-भट्ठों और अतिक्रमण से सिकुड़ती नदी

दुर्ग जिले के भोथलीडीह क्षेत्र में नदी किनारे संचालित ईंट-भट्ठों से तटों का कटाव स्पष्ट दिखाई देता है। वहीं कई स्थानों पर फार्म हाउसों और खेती की घेराबंदी ने नदी तक पहुंचने का प्राकृतिक रास्ता भी बंद कर दिया है।

प्रदूषित पानी में नहाने को मजबूर ग्रामीण

सरोना के पंप हाउस के पास बने एनीकेट के नीचे चंदनडीह के ग्रामीण उसी प्रदूषित पानी में स्नान करते मिले। ग्रामीणों का कहना है कि 15-16 वर्ष पहले खारुन का पानी स्वच्छ था और लोग इसका उपयोग पीने तक के लिए करते थे। अब पानी न पीने योग्य बचा है और न ही स्नान के लायक।

ग्रामीणों के अनुसार कई गांवों में आज भी हर घर तक नल-जल योजना नहीं पहुंची है, जिससे लोग मजबूरी में इसी नदी पर निर्भर हैं।

फैक्ट्रियों के अपशिष्ट से बढ़ा संकट

चंदनडीह से आगे एक फिल्टर प्लांट का अपशिष्ट भी नदी में मिलते देखा गया। वहीं गुमा और पठारीडीह क्षेत्र में फैक्ट्रियों के रासायनिक अपशिष्ट का असर साफ दिखाई देता है। नई बस्ती के ग्रामीणों का कहना है कि भूजल भी दूषित हो चुका है और उन्हें पीने का पानी टैंकरों से मंगाना पड़ता है।

कुम्हारी, मुरैठी और खैरखुंट जैसे गांव भी पेयजल संकट से जूझ रहे हैं। कई स्थानों पर नदी का पानी मटमैला और प्रदूषित नजर आया।

संगम पर साफ पानी, लेकिन पर्यटकों की लापरवाही

सोमनाथ पहुंचने पर खारुन का पानी अपेक्षाकृत साफ दिखाई देता है, जहां इसका संगम शिवनाथ नदी में होता है। हालांकि यहां भी बड़ी मात्रा में प्लास्टिक कचरा और पर्यटकों द्वारा छोड़ा गया अपशिष्ट नदी किनारे बिखरा मिला।

अब नहीं चेते तो खत्म हो जाएगी खारुन की पहचान

करीब 90 किलोमीटर लंबी खारुन नदी बालोद जिले के पेटेचुवा से निकलकर रायपुर, दुर्ग, बेमेतरा और बलौदाबाजार जिलों से होकर बहती है। महादेव घाट से सोमनाथ तक की इस ग्राउंड रिपोर्ट में साफ दिखा कि नदी की दुर्दशा के लिए केवल प्रशासन ही नहीं, बल्कि समाज भी समान रूप से जिम्मेदार है।

यदि गंदे नालों को नदी में मिलने से नहीं रोका गया, औद्योगिक अपशिष्टों पर सख्ती नहीं हुई, अतिक्रमण नहीं हटे और समाज ने नदी संरक्षण की जिम्मेदारी नहीं निभाई, तो आने वाले समय में खारुन केवल बरसात के मौसम में बहने वाली एक मौसमी धारा बनकर रह जाएगी।

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