रायगढ़: मां मानकेश्वरी मंदिर में 500 साल पुरानी बल पूजा की परंपरा, शरद पूर्णिमा पर 50 से 60 बकरों की दी गई बलि

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रायगढ़। CG DASTAK 

रायगढ़। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के घरघोड़ा क्षेत्र में स्थित मां मानकेश्वरी देवी मंदिर में शरद पूर्णिमा के अवसर पर सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा निभाई गई। मान्यता के अनुसार, रायगढ़ राजपरिवार की कुलदेवी मां मानकेश्वरी की आराधना के दौरान यहां विशेष बल पूजा का आयोजन होता है। इस वर्ष भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचे। समिति के सदस्यों के मुताबिक, इस दौरान लगभग 50 से 60 बकरों की बलि दी गई।

मंदिर में निभाई जाने वाली इस परंपरा को लेकर स्थानीय लोगों की गहरी आस्था है। रायगढ़ के अलावा ओडिशा और आसपास के दूर-दराज के गांवों से भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।

500 साल से चली आ रही है परंपरा

मां मानकेश्वरी देवी मंदिर जिला मुख्यालय रायगढ़ से लगभग 27 किलोमीटर दूर घरघोड़ा क्षेत्र में स्थित है। इसे रायगढ़ राजपरिवार की कुलदेवी का मंदिर माना जाता है। यहां हर साल शरद पूर्णिमा के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना और बल पूजा की परंपरा निभाई जाती है।

मानकेश्वरी समिति के पूर्व अध्यक्ष युधिष्ठिर यादव के मुताबिक, यह परंपरा लगभग 500 वर्षों से चली आ रही है। पूजा में शामिल होने के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों से श्रद्धालु पहुंचते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए देवी से प्रार्थना करते हैं।

पूजा के बाद निभाई जाती है बलि की परंपरा

स्थानीय परंपरा के अनुसार, पहले विधि-विधान से पूजा-पाठ किया जाता है। इसके बाद बलि की रस्म निभाई जाती है। समिति के सदस्यों का कहना है कि इस पूजा से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं पीढ़ियों से चली आ रही हैं।

स्क्रीनशॉट में प्रकाशित जानकारी के अनुसार, इस वर्ष करीब 50 से 60 बकरों की बलि दी गई। कुछ वर्षों में यह संख्या 100 से 120 तक पहुंचने की बात भी समिति के सदस्यों ने कही है।

बैगा से जुड़ी है विशेष धार्मिक मान्यता

इस पूजा में बैगा की भूमिका भी महत्वपूर्ण बताई जाती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, पूजा के दौरान बैगा के शरीर में देवी का वास होता है। श्रद्धालु इस धार्मिक परंपरा के तहत बैगा के पैर धोते हैं और उनके सिर पर दूध डालकर पूजा करते हैं। इसके बाद बलि दिए गए बकरों का रक्त पीने की परंपरा निभाए जाने की बात भी प्रकाशित रिपोर्ट में कही गई है।

यह जानकारी स्थानीय धार्मिक मान्यताओं और समिति के सदस्यों के बयानों पर आधारित है। इन मान्यताओं को स्वतंत्र रूप से प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

एक रात पहले होती है निशा पूजा

बल पूजा से एक रात पहले निशा पूजा की जाती है। इस दौरान विशेष धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। राजपरिवार की ओर से बैगा के अंगूठे में नवरत्न की अंगूठी पहनाई जाती है। समिति के पूर्व अध्यक्ष युधिष्ठिर यादव के अनुसार, सामान्य दिनों में यह अंगूठी ढीली रहती है, जबकि बल पूजा के दिन उसे बैगा के अंगूठे में कसकर पहनाया जाता है।

स्थानीय मान्यता में इस रस्म को देवी की उपस्थिति से जोड़कर देखा जाता है।

राजपरिवार ने बताया ऐतिहासिक महत्व

राज्यसभा सांसद और रायगढ़ राजपरिवार के सदस्य देवेंद्र प्रताप सिंह के मुताबिक, मां मानकेश्वरी देवी की पूजा की यह परंपरा रियासतकाल से चली आ रही है। उन्होंने बताया कि क्षेत्र के लोगों की देवी के प्रति गहरी आस्था है और आज भी पुराने रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है।

बल पूजा के अवसर पर मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र में श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है। दूर-दराज से आने वाले भक्त अपनी मनोकामनाओं के साथ देवी के दर्शन करते हैं और परंपरा के अनुसार पूजा-अर्चना में शामिल होते हैं।

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