
भानुप्रतापपुर में हजारों खाली बोतलें, ढक्कन और होलोग्राम बरामद होने के बाद आबकारी विभाग के अधिकारियों पर गाज गिरी। लेकिन लालपुर के पुराने मामले से जुड़ते सवाल अब प्लेसमेंट कंपनी BIS की जवाबदेही तक पहुंच रहे हैं।
कांकेर/रायपुर। छत्तीसगढ़ में सरकारी शराब दुकानों की व्यवस्था एक बार फिर बड़े सवालों के घेरे में है। भानुप्रतापपुर के बसंत नगर स्थित एक किराए के मकान से 4,409 खाली शराब की बोतलें-पौवे, हजारों ढक्कन, स्टीकर और होलोग्राम बरामद होने के बाद विभागीय कार्रवाई तेज हुई है। इस मामले में जिला आबकारी अधिकारी कार्यालय कांकेर के प्रभारी अधिकारी एवं भानुप्रतापपुर के आबकारी उप निरीक्षक को निलंबित कर दिया गया है।
पुलिस और जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि इतनी बड़ी मात्रा में शराब पैकिंग से जुड़ी सामग्री आखिर किस उद्देश्य से जमा की गई थी। प्रारंभिक जांच में अवैध पैकिंग अथवा मिलावट की आशंका की बात सामने आई है, जिसकी वास्तविक पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही होगी।
लालपुर से कांकेर तक उठता एक ही सवाल
CG Dastak की पड़ताल में सामने आया कि वर्ष 2025 के रायपुर लालपुर शराब दुकान मामले में भी प्लेसमेंट एजेंसी BIS यानी Bombay Intelligence Security (India) Ltd. का नाम सामने आया था। उस समय भी सरकारी शराब दुकान में मिलावटी शराब के मामले ने पूरे प्रदेश को हिला दिया था।

उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार लालपुर मामले में उसी समय BIS पर लगभग ₹1 करोड़ 56 लाख की पेनल्टी लगाए जाने की कार्रवाई हुई थी। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी बड़ी पेनल्टी के बावजूद कंपनी को ब्लैकलिस्ट क्यों नहीं किया गया और क्या बाद में भी उसे दूसरे क्षेत्रों में काम मिलता रहा?
यही सवाल आज कांकेर के मामले के बाद फिर खड़ा हो गया है, क्योंकि यहां भी सरकारी शराब व्यवस्था से जुड़े क्षेत्र में शराब पैकिंग और ब्रांडिंग से संबंधित भारी मात्रा में सामग्री बरामद हुई है।
क्या केवल अफसर ही जिम्मेदार?
भानुप्रतापपुर मामले में अधिकारियों के निलंबन और दोषी कर्मचारियों पर कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। लेकिन जनता यह जानना चाहती है कि जिस प्लेसमेंट एजेंसी के माध्यम से सरकारी शराब दुकानों में कर्मचारी तैनात किए जाते हैं, उसकी जवाबदेही कब तय होगी?
यदि किसी कर्मचारी की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है तो उसकी जिम्मेदारी तय होना जरूरी है, लेकिन साथ ही यह भी जांच का विषय है कि कर्मचारी किस एजेंसी के माध्यम से नियुक्त हुआ, उसकी निगरानी किस स्तर पर हुई और कंपनी की जवाबदेही कितनी तय की गई।
जनता की सेहत से जुड़ा सबसे गंभीर सवाल
यह खबर किसी व्यक्ति की मौत को मिलावटी शराब से जोड़ने का दावा नहीं करती। बल्कि यह एक सामान्य जनहित का प्रश्न उठाती है। आम तौर पर जब कोई व्यक्ति शराब पीने के बाद बीमार पड़ता है या उसकी मौत होती है तो समाज अक्सर इसे केवल शराब पीने का परिणाम मान लेता है। लेकिन अगर किसी मामले में शराब की गुणवत्ता ही संदिग्ध हो तो उसकी वैज्ञानिक जांच भी उतनी ही जरूरी है।
आखिर बोतल के भीतर क्या था? क्या उसमें किसी प्रकार की मिलावट हुई थी? क्या संदिग्ध शराब के मामलों में टॉक्सिकोलॉजी और गुणवत्ता जांच को भी गंभीरता से जोड़ा जाता है? भानुप्रतापपुर जैसी बरामदगी के बाद ये सवाल स्वाभाविक रूप से और महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
अब विभाग और आबकारी मंत्री से सीधे सवाल
- क्या लालपुर मामले में BIS पर लगी ₹1.56 करोड़ की पेनल्टी के बाद आगे कोई बड़ी कार्रवाई हुई?
- क्या BIS को ब्लैकलिस्ट किया जाएगा या नहीं?
- क्या कंपनी को दूसरे क्षेत्रों में काम दिए जाने की जांच होगी?
- क्या कांकेर मामले में प्लेसमेंट एजेंसी की भूमिका की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी?
- क्या सरकारी शराब दुकानों में गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था की दोबारा समीक्षा होगी?
CG Dastak का निष्कर्ष
लालपुर में कार्रवाई हुई, पेनल्टी लगी। कांकेर में हजारों खाली बोतलें, ढक्कन और होलोग्राम बरामद हुए तो अधिकारी निलंबित हुए। अब निगाहें विभाग और आबकारी मंत्री पर टिकी हैं कि कार्रवाई केवल कर्मचारियों और अधिकारियों तक सीमित रहती है या प्लेसमेंट कंपनी BIS की जवाबदेही भी तय की जाती है।
सबसे बड़ा सवाल यही है— क्या BIS ब्लैकलिस्ट होगी या सरकारी शराब व्यवस्था में मिलावट के आरोपों का यह खेल ऐसे ही चलता रहेगा? जवाब अब सरकार और जांच एजेंसियों को देना है।









