उत्तरपुस्तिका से गायब थे 4 पन्ने, हाईकोर्ट ने आयोग को माना जिम्मेदार; अभ्यर्थी को मिलेगा 50 हजार रुपये मुआवजा

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छत्तीसगढ़। CG DASTAK

छत्तीसगढ़। एक अभ्यर्थी की उत्तरपुस्तिका से चार पन्ने गायब होने और शिकायत के बावजूद जांच पूरी नहीं करने के मामले में हाईकोर्ट ने लोक सेवा आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने आयोग को जिम्मेदार ठहराते हुए अभ्यर्थी को 50 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभ्यर्थी के चयन की संभावना नहीं होने का तर्क देकर आयोग अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। उत्तरपुस्तिका के पन्ने गायब होने की जानकारी मिलने के बाद भी अभ्यर्थी को सूचित नहीं करना और जिम्मेदार व्यक्ति का पता लगाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाना गंभीर चूक है।

उत्तरपुस्तिका से गायब थे चार पन्ने

मामले में अभ्यर्थी ने सूचना के अधिकार (RTI) के तहत अपनी उत्तरपुस्तिका की कॉपी मांगी थी। जांच में पता चला कि सामान्य अध्ययन-5 (पेपर-7) के भाग-2 में पेज नंबर 17 से 20 तक गायब थे।

इन चार पन्नों में प्रश्न क्रमांक 9 से 12 तक के उत्तर लिखे गए थे। इन प्रश्नों के कुल अंक 30 थे। पन्ने गायब होने की जानकारी मिलने के बाद अभ्यर्थी ने 5 फरवरी 2021 को संबंधित अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन उसे कोई जवाब नहीं मिला।

इसके बाद अभ्यर्थी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याचिकाकर्ता ने मूल रिकॉर्ड पेश करने, स्वतंत्र जांच कराने और 50 लाख रुपये मुआवजा देने की मांग की थी।

आयोग ने चयन की संभावना नहीं होने का दिया तर्क

सुनवाई के दौरान आयोग ने बताया कि मूल्यांकनकर्ता ने 27 सितंबर 2019 को ही उत्तरपुस्तिका के पन्ने गायब होने की रिपोर्ट दे दी थी।

आयोग ने अदालत में तर्क दिया कि यदि अभ्यर्थी को गायब पन्नों के पूरे 30 अंक भी मिल जाते, तब भी उसके कुल अंक 725.5 होते। ये अंक अनारक्षित वर्ग के अंतिम चयनित अभ्यर्थी के 737.5 अंकों से कम थे।

अभ्यर्थी को वास्तव में 695.5 अंक मिले थे। आयोग ने इसी आधार पर कहा कि अतिरिक्त अंक मिलने के बावजूद उसका चयन नहीं हो पाता।

जांच पूरी नहीं करने पर हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी

हाईकोर्ट ने आयोग की दलील को उसकी जिम्मेदारी से बचने का आधार नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि उत्तरपुस्तिका के पन्ने गायब होने की जानकारी मिलने के बाद भी अभ्यर्थी को सूचना नहीं दी गई। साथ ही, जिम्मेदार व्यक्ति का पता लगाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए और जांच भी पूरी नहीं की गई।

कोर्ट के अनुसार, आयोग की इस चूक से अभ्यर्थी को मानसिक परेशानी हुई। इसके अलावा, मामले की जानकारी जुटाने और मुकदमा लड़ने में भी उसे खर्च उठाना पड़ा।

अभ्यर्थी को 50 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश

मामले की परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने अभ्यर्थी को 50 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। इसके साथ ही याचिका का निराकरण कर दिया।

यह मामला परीक्षा प्रक्रिया में उत्तरपुस्तिकाओं के सुरक्षित रखरखाव, पारदर्शिता और शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई की जिम्मेदारी को रेखांकित करता है।

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