
नई दिल्ली। CG DASTAK
जुलाई में 9.78% थी थोक महंगाई, अगस्त में फिर बढ़ी; सरकार ने 14 सितंबर को जारी किए आंकड़े, आम आदमी पर भी पड़ सकता है अप्रत्यक्ष असर
नई दिल्ली। देश में थोक स्तर पर महंगाई का दबाव एक बार फिर बढ़ गया है। अगस्त 2026 में थोक मूल्य सूचकांक (WPI) आधारित महंगाई दर बढ़कर 9.92% पहुंच गई। जुलाई में यह दर 9.78% थी। यानी एक महीने में थोक महंगाई में और तेजी दर्ज की गई। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक यह करीब 8 महीने के दौरान सबसे ऊंचा स्तर है।
सरकार की ओर से अगस्त के WPI आंकड़े 14 सितंबर 2026 को जारी किए गए। WPI थोक बाजार में वस्तुओं की कीमतों में होने वाले बदलाव को मापता है। आधिकारिक रिलीज कैलेंडर के अनुसार अगस्त 2026 के WPI आंकड़े 14 सितंबर को जारी किए जाने थे।
जनवरी से लगातार बढ़ी थोक महंगाई
2026 में थोक महंगाई के आंकड़ों पर नजर डालें तो जनवरी में यह 1.81% थी। फरवरी में 2.13%, मार्च में 3.88% और अप्रैल में यह अचानक बढ़कर 8.26% पहुंच गई।
इसके बाद मई में थोक महंगाई 9.68%, जून में 9.87%, जुलाई में 9.78% और अगस्त में 9.92% दर्ज की गई।
यानी साल की शुरुआत में जहां थोक स्तर पर महंगाई अपेक्षाकृत कम थी, वहीं कुछ महीनों में इसमें तेज उछाल देखने को मिला है।
खाने-पीने की चीजों से लेकर ईंधन तक असर
अगस्त में थोक महंगाई बढ़ने के पीछे खाने-पीने की वस्तुओं, ईंधन एवं बिजली और मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी को प्रमुख कारण बताया गया है।

खाद्य वस्तुओं और दूसरी जरूरी चीजों की थोक कीमतों में बढ़ोतरी का असर आगे चलकर सप्लाई चेन के जरिए बाजार की कीमतों पर भी पड़ सकता है। हालांकि WPI में तेजी का मतलब यह नहीं है कि हर वस्तु की खुदरा कीमत उसी अनुपात में बढ़ गई है।
₹100 का सामान हुआ ₹109.92?
9.92% की थोक महंगाई को आसान भाषा में समझें तो अगर पिछले साल इसी अवधि में थोक बाजार में किसी सामान की कीमत ₹100 थी और बाकी परिस्थितियां समान रहें, तो समान कीमत स्तर की तुलना में उसका मूल्य करीब ₹109.92 माना जा सकता है।
हालांकि यह सिर्फ महंगाई दर को समझाने का गणितीय उदाहरण है। इसका मतलब यह नहीं है कि हर वस्तु की कीमत ठीक 9.92% बढ़ी है।
आम आदमी पर क्या असर पड़ेगा?
थोक कीमतों में लंबे समय तक बढ़ोतरी रहने पर इसका असर उत्पादकों, कारोबारियों और सप्लाई चेन के अलग-अलग हिस्सों पर पड़ सकता है। अगर उत्पादन लागत बढ़ती है तो कंपनियां और कारोबारी उसका कुछ हिस्सा आगे उपभोक्ताओं तक पहुंचा सकते हैं।
लेकिन WPI और खुदरा महंगाई (CPI) अलग-अलग सूचकांक हैं। सरकार के अनुसार WPI मुख्य रूप से थोक स्तर की कीमतों को मापता है, जबकि CPI उपभोक्ताओं द्वारा चुकाई जाने वाली खुदरा कीमतों पर आधारित होता है। इसलिए WPI में बढ़ोतरी का असर खुदरा बाजार में उसी समय और उसी अनुपात में दिखाई देना जरूरी नहीं है।
महंगाई के दो प्रमुख पैमाने
भारत में महंगाई को समझने के लिए मुख्य रूप से CPI और WPI को देखा जाता है। CPI यानी Consumer Price Index आम उपभोक्ता द्वारा खरीदी जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में बदलाव को दर्शाता है।
वहीं WPI यानी Wholesale Price Index थोक बाजार में वस्तुओं की कीमतों में बदलाव को मापता है। नई WPI श्रृंखला का आधार वर्ष 2022-23 किया गया है और सरकार ने 2026 में संशोधित WPI श्रृंखला लागू की है।
आगे क्या?
अगस्त में 9.92% तक पहुंची थोक महंगाई अब अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण संकेत है। आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि खाद्य पदार्थों, ईंधन और विनिर्मित उत्पादों की कीमतों का दबाव कितना कम होता है और इसका असर खुदरा बाजार पर किस स्तर तक पहुंचता है।









