सड़क नहीं, संवेदना भी नहीं, सरगुजा के लकरालता गांव में सड़क के अभाव ने मौत के बाद भी ली परीक्षा, खाट में शव ढोने को मजबूर हुए ग्रामीण

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सरगुजा | CG DASTAK

सरगुजा जिले के सीतापुर थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्राम भारतपुर–लकरालता (चीनीपानी) से एक बार फिर बुनियादी सुविधाओं की बदहाली की दिल दहला देने वाली तस्वीर सामने आई है। दुर्गम और पहाड़ी इलाके में सड़क सुविधा के अभाव ने न सिर्फ ग्रामीणों का जीवन कठिन बना रखा है, बल्कि मृत्यु के बाद भी अपनों को अमानवीय संघर्ष झेलने पर मजबूर कर रहा है।
तालाब में डूबने से मृत आदिवासी युवक सुरेन्द्र तिर्की के शव को स्वजन और ग्रामीणों ने खाट में लादकर कई किलोमीटर पैदल ढोया। जब वे किसी तरह मुख्य मार्ग तक पहुंचे, तब जाकर शव वाहन मिला और शव को पोस्टमार्टम के लिए सीतापुर भेजा जा सका।

📌 क्या है पूरा मामला?

ग्राम लकरालता निवासी सुरेन्द्र तिर्की (उम्र लगभग 29 वर्ष) 29 दिसंबर की सुबह करीब 11 बजे मछली पकड़ने के लिए घर से निकला था। देर शाम तक वापस नहीं लौटने पर परिजनों ने उसकी तलाश शुरू की।
30 दिसंबर को सीतापुर थाने में उसकी गुमशुदगी दर्ज कराई गई। पुलिस ने युवक की चप्पल और अन्य सामान के आधार पर आसपास के जंगल और तालाबों में खोजबीन तेज की।
31 दिसंबर को गांव के ही एक तालाब में सुरेन्द्र तिर्की का शव बरामद हुआ। प्रथम दृष्टया मौत का कारण तालाब में डूबना बताया गया है।

🛣️ सड़क नहीं, इसलिए खाट बना एम्बुलेंस

सबसे दर्दनाक पहलू यह रहा कि गांव तक आज तक पक्की सड़क नहीं पहुंची है। दुर्गम पहाड़ी रास्तों और घने जंगलों के कारण न तो शव वाहन गांव तक पहुंच सका, न ही एम्बुलेंस। मजबूरी में ग्रामीणों ने खाट पर शव रखकर कई किलोमीटर पैदल सफर किया।
ग्रामीणों का कहना है कि—
“बीमार होने पर इलाज तक मुश्किल है, और मौत के बाद भी सम्मानजनक विदाई नसीब नहीं होती।”

प्रशासन और जनप्रतिनिधियों पर सवाल

यह घटना एक बार फिर ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में विकास के दावों पर सवाल खड़े करती है। वर्षों से सड़क की मांग के बावजूद लकरालता जैसे गांव आज भी मुख्यधारा से कटे हुए हैं।
ग्रामीणों ने मांग की है कि—
गांव तक तत्काल सड़क निर्माण किया जाए
दुर्गम इलाकों में आपातकालीन सेवाओं की स्थायी व्यवस्था हो
आदिवासी अंचलों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जाए

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